प्रसंगवश : क्राइम रिपोर्टर का झूठ बना ब्रेकिंग न्यूज, पुलिस ने सच साबित कर दिखाया !

भारत की प्रतिष्ठित ई-मार्केटिंग कम्पनी ’स्नैपडील’ की साफ्टवेयर इंजीनियर दीप्ति सरना का अपहरण हुआ था। इस काली करतूत के पीछे मास्टर माइंड कौन है?... दीप्ति का अपहरण क्यों किया गया?... अपहरणकर्ताओं के चंगुल से 36 घंटे बाद दीप्ति कैसे मुक्त हुई?... क्या अपहरणकर्ताओं ने फिरौती वसूलने के बाद दीप्ति को मुक्त किया या पुलिस के बढ़ते दबाव के कारण सुनसान स्थान पर छोड़कर फरार हो गये?... इत्यादि सवालों के जवाब गाजियाबाद पुलिस अपनी तफ्तीश/जांच-पड़ताल के बाद ही दे सकती हैै। फिलहाल, इतना तो स्पष्ट है कि वर्तमान वर्ष उत्तर प्रदेश का चुनावी वर्ष है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 15 मार्च, 2012 को शपथ ग्रहण की थी। व्यवहारिक रूप से उनकी सरकार का कार्यकाल 14 मार्च, 2017 तक है। सरकार के अंतिम वर्ष के कार्यकाल को ही चुनावी वर्ष कहा जाता है। आकड़ों पर नजर डाले तो चुनावी वर्ष में अपहरण का ग्राफ अचानक बढ़ जाता है। पिछले चुनावी वर्ष अर्थात 2011 में अपहरण के कुल 8,500 मामले पंजीकृत हुए थे, जो 2010 में पंजीकृत अपहरण के 6,321 मामलों की तुलना में काफी अधिक हैं। 2015 में अपहरण के 12,361 मामले पंजीकृत हुए हैं, जिसमें चुनावी वर्ष में बेतहासा वृद्धि होना लगभग तय हैं। यह आकड़ा कितना होगा? इसका जवाब आने वाले समय के गर्भ में है। दीप्ति सरना अपहरण काण्ड ने अपहरण से जुड़ी कुछ पुरानी यादांे को ताजा कर दिया है, जिसमें क्राइम रिपोर्टर (मेरे) के झूठ टेलीविजन चैनल का ब्रेकिंग न्यूज बना और पुलिस ने सच साबित करके दिखाया था। प्रसंगवश घटनाक्रम प्रस्तुत है:-
बात चुनावी वर्ष 2007 की है। तब उत्तर प्रदेश के कथित क्राइम कैटिपल में क्राइम रिपोर्टर था। रात 9 बजे सूत्र ने बताया कि आधा दर्जन बदमाशों ने तमंचे से आतंकित कर स्कूटर सवार छोटे भाई का अपहरण कर लिया तथा फिरौती की रकम का बंदोबस्त करने के लिए बड़े भाई को छोड़ दिया। इस घटना के बारे पूछने पर एसएसपी ने बताया कि तहरीर के आधार पर रिपोर्ट दर्ज कर कार्रवाई की जा रही है। पुलिस मौके पर है। अपहृत को सकुशल मुक्त कराने का प्रयास किया जा रहा है। अपहणकर्ताओं को किसी भी दशा में बक्शा नहीं जायेगा। इस प्रकरण से सम्बन्धित तीन कॉलम का समाचार प्रकाशित हुआ। दूसरे दिन रविवार था। रविवार के दिन पुलिस ऑफिस बंद होने से खबरों का जितना अधिक अकाल होता था, अखबार के पन्नों भरने का उतना ही अधिक दबाव।
रविवार को डे-मीटिंग के बाद मोटर साइकिल को सर्विसिंग के लिए मैकेनिक के पास छोड़ दिया और अपहरण की वारदात का फालोअप करने की योजना बनाने लगा। उक्त प्रकरण में सम्बन्धित एसएचओ और सीओ से टेलीफोन पर बातचीत हुई, लेकिन फॉलोअप लिखने लायक तथ्य नहीं मिलें। तभी अचानक याद आया कि अपहृत जिस गांव का रहने वाला है, उसी गांव के दुकानदार से मैनें कुछ महीना पहले कम्प्यूटर खरीदा था। टेलीफोन पर कम्प्यूटर विक्रेता ने बताया कि अपहृत की पारिवारिक व आर्थिक पृष्ठभूमि काफी सुदृढ़ है। पांच भाईयों में सबसे छोटा है। चारों बड़े भाई सऊदी अरब में रहते है। इन दिनों सभी गांव आये हुए है। यह सुनते ही रिपोर्टर मन में कई तरह के सवाल उठने लगे, जिनका जवाब जानने के लिए अपहृत के गांव जाना जरूरी था, लेकिन तब तक मैकेनिक मोटर साइकिल के कई पुर्जो को अलग कर चुका था।
मैं प्रिण्ट मीडिया में क्राइम रिपोर्टर था, लिहाजा इलेक्ट्रानिक मीडिया से कोई स्पर्धा नहीं थी। टेलीविजन चैनलों के स्ट्रींगर के पास कई कैमरामैन होते थे, जिनसे दोस्ताना सम्बन्ध थे। कई बार खबरों का आदान-प्रदान भी होता रहता था। वैकल्पिक वाहन की तलाश में एक प्रादेशिक टीवी चैनल के कैमरामैन को फोन किया तथा अपहृत के गांव में चलने को कहा, लेकिन अपनी व्यस्तता के कारण उसने मना कर दिया। मेरा अपहृत के गांव में जाना जरूरी था, लिहाजा कैमरामैन को साथ ले जाने के लिए मैंने झूठ बोला कि अपहृत के परिजनों से दो करोड़ रूपये की फिरौती मांगी गई है। यह सुनते ही वह जाने के लिए तैयार हो गया। अपहृत का गांव नेशनल हाइवे पर शहर से 8 किलोमीटर की दूरी पर था। रास्ते में ट्रकों की आवाजाही काफी अधिक थी। तभी मोबाइल पर किसी परिचित का फोन आया। शोर के कारण ठीक से बातचीत नहीं हो पा रही थी, लिहाजा मेरे कहने पर कैमरामैन ने मोटरसाइकिल रोक दी। मैं अपनी बातों में व्यस्त था। तभी कैमरामैन ने अपने स्ट्रींगर बॉस को फोन पर दो करोड़ रूपया मांगने की बात बता दी। स्ट्रींगर ने किसी पुलिस अधिकारी से क्रांस चेक किये बगैर ही चैनल के इनपुट हेड को बताया। कुछ देर बाद उसके चैनल पर मेरा झूठ ’ब्रेकिंग न्यूज’ बनकर चलने लगा। यह देख अन्य प्रतिद्वंदी टेलीविजन चैनलों के स्टूडियो से स्थानीय स्ट्रींगरों के पास फोन आने लगे। अन्य टेलीविजन चैनलों के स्ट्रींगरों ने दो करोड़ की फिरौती मांगें जाने के बाबत पूछने पर एसएसपी ने साफ मना कर दिया।
खैर... मैं कैमरामैन की मदद से अपहृत के घर गया। वहां का माहौल काफी गमगीन था। अपहृत के परिजनों से मिलने के लिए रिश्तेदारों व अन्य शुभचिंतकों के आने का क्रम लगा हुआ था। माहौल ऐसा था कि न तो मेरे से कुछ पूछते बन रहा था और न तो कोई घटना के बारे में बोल रहा था। आंखों ने जैसा माहौल देखा था, वैसा ही फॉलोअप लिखा।
इस घटना के पांच दिन बाद पुलिस ने मुखबिर की सूचना के आधार पर दो अपहरणकर्ताओं को गिरफ्तार किया, जिनसे पूछताछ के बाद पुलिस ने गन्ने के खेत को चारों तरफ से घेर लिया। मुठभेड़ में दो अपहरणकर्ता मारे गये तथा अपहृत व्यक्ति सकुशल मुक्त हुआ। देर रात पुलिस लाइन में एसएसपी की मौजूदगी में आईजी ने प्रेस कॉफ्रेंस किया, जिसमें न तो अपहृत व्यक्ति को प्रस्तुत किया गया और न तो गिरफ्तार किये गये अपहरणकर्ताओं को। आईजी ने अपहृत के परिजनों से दो करोड़ रूपये की फिरौती मांगे जाने दावा जरूर किया, जिसे सुनकर चकित रह गया। मुठभेड़ में मारे गये बदमाशों का लम्बा आपराधिक रिकार्ड था। मुठभेड़ स्थल अपहृत को रखने के लिए गन्ने के पौधों से बने झोपड़ी को आंखों से देखकर आया था, लिहाजा आईजी के दावों पर सवाल उठाना उचित नहीं लग रहा था। इस प्रकरण को कलेजे के कोने में दबाकर रखना ही उचित था। इस घटना को बीते लगभग 9 बरस हो चुके हैं। चुनावी वर्ष में ‪#‎दीप्ति‬ सरना अपहरण काण्ड के बाद अचानक यादें ताजा हो गयी।