प्रसंगवश : क्राइम रिपोर्टर का झूठ बना ब्रेकिंग न्यूज, पुलिस ने सच साबित कर दिखाया !

भारत की प्रतिष्ठित ई-मार्केटिंग कम्पनी ’स्नैपडील’ की साफ्टवेयर इंजीनियर दीप्ति सरना का अपहरण हुआ था। इस काली करतूत के पीछे मास्टर माइंड कौन है?... दीप्ति का अपहरण क्यों किया गया?... अपहरणकर्ताओं के चंगुल से 36 घंटे बाद दीप्ति कैसे मुक्त हुई?... क्या अपहरणकर्ताओं ने फिरौती वसूलने के बाद दीप्ति को मुक्त किया या पुलिस के बढ़ते दबाव के कारण सुनसान स्थान पर छोड़कर फरार हो गये?... इत्यादि सवालों के जवाब गाजियाबाद पुलिस अपनी तफ्तीश/जांच-पड़ताल के बाद ही दे सकती हैै। फिलहाल, इतना तो स्पष्ट है कि वर्तमान वर्ष उत्तर प्रदेश का चुनावी वर्ष है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 15 मार्च, 2012 को शपथ ग्रहण की थी। व्यवहारिक रूप से उनकी सरकार का कार्यकाल 14 मार्च, 2017 तक है। सरकार के अंतिम वर्ष के कार्यकाल को ही चुनावी वर्ष कहा जाता है। आकड़ों पर नजर डाले तो चुनावी वर्ष में अपहरण का ग्राफ अचानक बढ़ जाता है। पिछले चुनावी वर्ष अर्थात 2011 में अपहरण के कुल 8,500 मामले पंजीकृत हुए थे, जो 2010 में पंजीकृत अपहरण के 6,321 मामलों की तुलना में काफी अधिक हैं। 2015 में अपहरण के 12,361 मामले पंजीकृत हुए हैं, जिसमें चुनावी वर्ष में बेतहासा वृद्धि होना लगभग तय हैं। यह आकड़ा कितना होगा? इसका जवाब आने वाले समय के गर्भ में है। दीप्ति सरना अपहरण काण्ड ने अपहरण से जुड़ी कुछ पुरानी यादांे को ताजा कर दिया है, जिसमें क्राइम रिपोर्टर (मेरे) के झूठ टेलीविजन चैनल का ब्रेकिंग न्यूज बना और पुलिस ने सच साबित करके दिखाया था। प्रसंगवश घटनाक्रम प्रस्तुत है:-
बात चुनावी वर्ष 2007 की है। तब उत्तर प्रदेश के कथित क्राइम कैटिपल में क्राइम रिपोर्टर था। रात 9 बजे सूत्र ने बताया कि आधा दर्जन बदमाशों ने तमंचे से आतंकित कर स्कूटर सवार छोटे भाई का अपहरण कर लिया तथा फिरौती की रकम का बंदोबस्त करने के लिए बड़े भाई को छोड़ दिया। इस घटना के बारे पूछने पर एसएसपी ने बताया कि तहरीर के आधार पर रिपोर्ट दर्ज कर कार्रवाई की जा रही है। पुलिस मौके पर है। अपहृत को सकुशल मुक्त कराने का प्रयास किया जा रहा है। अपहणकर्ताओं को किसी भी दशा में बक्शा नहीं जायेगा। इस प्रकरण से सम्बन्धित तीन कॉलम का समाचार प्रकाशित हुआ। दूसरे दिन रविवार था। रविवार के दिन पुलिस ऑफिस बंद होने से खबरों का जितना अधिक अकाल होता था, अखबार के पन्नों भरने का उतना ही अधिक दबाव।
रविवार को डे-मीटिंग के बाद मोटर साइकिल को सर्विसिंग के लिए मैकेनिक के पास छोड़ दिया और अपहरण की वारदात का फालोअप करने की योजना बनाने लगा। उक्त प्रकरण में सम्बन्धित एसएचओ और सीओ से टेलीफोन पर बातचीत हुई, लेकिन फॉलोअप लिखने लायक तथ्य नहीं मिलें। तभी अचानक याद आया कि अपहृत जिस गांव का रहने वाला है, उसी गांव के दुकानदार से मैनें कुछ महीना पहले कम्प्यूटर खरीदा था। टेलीफोन पर कम्प्यूटर विक्रेता ने बताया कि अपहृत की पारिवारिक व आर्थिक पृष्ठभूमि काफी सुदृढ़ है। पांच भाईयों में सबसे छोटा है। चारों बड़े भाई सऊदी अरब में रहते है। इन दिनों सभी गांव आये हुए है। यह सुनते ही रिपोर्टर मन में कई तरह के सवाल उठने लगे, जिनका जवाब जानने के लिए अपहृत के गांव जाना जरूरी था, लेकिन तब तक मैकेनिक मोटर साइकिल के कई पुर्जो को अलग कर चुका था।
मैं प्रिण्ट मीडिया में क्राइम रिपोर्टर था, लिहाजा इलेक्ट्रानिक मीडिया से कोई स्पर्धा नहीं थी। टेलीविजन चैनलों के स्ट्रींगर के पास कई कैमरामैन होते थे, जिनसे दोस्ताना सम्बन्ध थे। कई बार खबरों का आदान-प्रदान भी होता रहता था। वैकल्पिक वाहन की तलाश में एक प्रादेशिक टीवी चैनल के कैमरामैन को फोन किया तथा अपहृत के गांव में चलने को कहा, लेकिन अपनी व्यस्तता के कारण उसने मना कर दिया। मेरा अपहृत के गांव में जाना जरूरी था, लिहाजा कैमरामैन को साथ ले जाने के लिए मैंने झूठ बोला कि अपहृत के परिजनों से दो करोड़ रूपये की फिरौती मांगी गई है। यह सुनते ही वह जाने के लिए तैयार हो गया। अपहृत का गांव नेशनल हाइवे पर शहर से 8 किलोमीटर की दूरी पर था। रास्ते में ट्रकों की आवाजाही काफी अधिक थी। तभी मोबाइल पर किसी परिचित का फोन आया। शोर के कारण ठीक से बातचीत नहीं हो पा रही थी, लिहाजा मेरे कहने पर कैमरामैन ने मोटरसाइकिल रोक दी। मैं अपनी बातों में व्यस्त था। तभी कैमरामैन ने अपने स्ट्रींगर बॉस को फोन पर दो करोड़ रूपया मांगने की बात बता दी। स्ट्रींगर ने किसी पुलिस अधिकारी से क्रांस चेक किये बगैर ही चैनल के इनपुट हेड को बताया। कुछ देर बाद उसके चैनल पर मेरा झूठ ’ब्रेकिंग न्यूज’ बनकर चलने लगा। यह देख अन्य प्रतिद्वंदी टेलीविजन चैनलों के स्टूडियो से स्थानीय स्ट्रींगरों के पास फोन आने लगे। अन्य टेलीविजन चैनलों के स्ट्रींगरों ने दो करोड़ की फिरौती मांगें जाने के बाबत पूछने पर एसएसपी ने साफ मना कर दिया।
खैर... मैं कैमरामैन की मदद से अपहृत के घर गया। वहां का माहौल काफी गमगीन था। अपहृत के परिजनों से मिलने के लिए रिश्तेदारों व अन्य शुभचिंतकों के आने का क्रम लगा हुआ था। माहौल ऐसा था कि न तो मेरे से कुछ पूछते बन रहा था और न तो कोई घटना के बारे में बोल रहा था। आंखों ने जैसा माहौल देखा था, वैसा ही फॉलोअप लिखा।
इस घटना के पांच दिन बाद पुलिस ने मुखबिर की सूचना के आधार पर दो अपहरणकर्ताओं को गिरफ्तार किया, जिनसे पूछताछ के बाद पुलिस ने गन्ने के खेत को चारों तरफ से घेर लिया। मुठभेड़ में दो अपहरणकर्ता मारे गये तथा अपहृत व्यक्ति सकुशल मुक्त हुआ। देर रात पुलिस लाइन में एसएसपी की मौजूदगी में आईजी ने प्रेस कॉफ्रेंस किया, जिसमें न तो अपहृत व्यक्ति को प्रस्तुत किया गया और न तो गिरफ्तार किये गये अपहरणकर्ताओं को। आईजी ने अपहृत के परिजनों से दो करोड़ रूपये की फिरौती मांगे जाने दावा जरूर किया, जिसे सुनकर चकित रह गया। मुठभेड़ में मारे गये बदमाशों का लम्बा आपराधिक रिकार्ड था। मुठभेड़ स्थल अपहृत को रखने के लिए गन्ने के पौधों से बने झोपड़ी को आंखों से देखकर आया था, लिहाजा आईजी के दावों पर सवाल उठाना उचित नहीं लग रहा था। इस प्रकरण को कलेजे के कोने में दबाकर रखना ही उचित था। इस घटना को बीते लगभग 9 बरस हो चुके हैं। चुनावी वर्ष में ‪#‎दीप्ति‬ सरना अपहरण काण्ड के बाद अचानक यादें ताजा हो गयी।

अंतर्राष्ट्रीय संचार व्यवस्था और सूचना राजनीति

  • अवधेश कुमार यादव


प्रजातांत्रिक देशों में सत्ता का संचालन संवैधानिक प्रावधानों के तहत होता है। इन्हीं प्रावधानों के अनुरूप नागरिक आचरण करते हैं तथा संचार माध्यम संदेशों का सम्प्रेषण। संचार माध्यमों पर राष्ट्रों की अस्मिता भी निर्भर है, क्योंकि इनमें दो देशों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध को बनाने, बनाये रखने और बिगाड़ने की क्षमता होती है। आधुनिक संचार माध्यम तकनीक आधारित है। इस आधार पर सम्पूर्ण विश्व को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। पहला- उन्नत संचार तकनीक वाले देश, जो सूचना राजनीति के तहत साम्राज्यवाद के विस्तार में लगे हैं, और दूसरा- अल्पविकसित संचार तकनीक वाले देश, जो अपने सीमित संसाधनों के बल पर सूचना राजनीति और साम्राज्यवाद के विरोधी हैं। उपरोक्त विभाजन के आधार पर कहा जा सकता है कि विश्व वर्तमान समय में भी दो गुटों में विभाजित है। यह बात अलग है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के तत्काल बाद का विभाजन राजनीतिक था तथा वर्तमान विभाजन संचार तकनीक पर आधारित है।

अंतर्राष्ट्रीय संचार : अंतर्राष्ट्रीय संचार की अवधारणा का सम्बन्ध मानव सभ्यता के साथ जुड़ा हुआ है, क्योंकि मानव जैसे-जैसे विकास की ओर अग्रसर होता गया, वैसे-वैसे अन्य देशों की सूचनाओं और सांस्कृतियों गतिविधियों के संदर्भ में जानने का प्रयत्न करने लगा। परिणामतः अंतर्राष्ट्रीय संचार की अवधारणा का सूत्रपात हुआ। सभ्यता के विकास के प्रारंभिक युग में 'देशाटन' एक मात्र अंतर्राष्ट्रीय संचार का माध्यम था, जिसके तहत एक देश के नागरिक समूह बनाकर जल-थल मार्ग से दूसरे देश का भ्रमण करते थे तथा वहां के नागरिकों से मिलकर एक-दूसरे की सांस्कृतिक गतिविधियों से परिचित होते थे। इसके बाद, स्वदेश लौटकर अपने समाज के लोगों को यात्रा-वृतांत सुनाते तथा दूसरे देशों की संस्कृति के बारे में जानकारी देते थे।

अंतर्राष्ट्रीय संचार के क्षेत्र में तकनीकी का उपयोग 18वीं शताब्दी में सर्वप्रथम ब्रिटेन ने अपने विदेशी उपनिवेशों में सत्ता पर शासकीय नियंत्रण बनाये रखने के लिए किया। इसके लिए सम्रुद्री केबल लाइन की सहायता से संदेशों का आदान-प्रदान किया जाता था। हालांकि, इसमें सामान्य जनों की सहभागिता नहीं होती थी। सामान्य जन 'देशाटन' के माध्यम से ही अंतर्राष्ट्रीय संचार का कार्य करते थे। बाद में मुद्रण तकनीक के उद्भव व विकास के बाद पुस्तकों के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय संचार का कार्य किया जाने लगा।

अंतर्राष्ट्रीय संचार और समाचार समिति: प्रिण्ट माध्यमों के विकास के बाद अंतर्राष्ट्रीय संचार के क्षेत्र में समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं का उपयोग किया जाने लगा। बंदरगाहों पर नियुक्त संवाददाता नाविकों और यात्रियों से वार्तालाप कर अंतर्राष्ट्रीय समाचारों का संकलन करते थेे। ऐसे समाचारों में निष्पक्षता व प्रमाणिकता का अभाव था, जिसके चलते एक निश्चित स्थान पर विश्वसनीय स्रोतों से समाचारों के संकलन और प्रकाशन के लिए उपलब्ध कराने की आवश्यकता महसूस की गई, जिसके चलते समाचार समिति (News Agency)  की परिकल्पना का जन्म हुआ। फ्रांसीसी नागरिक चाल्र्स आवास को आधुनिक समाचार समिति का जनक कहा जाता है, जिसने सन् 1825 में 'न्यूज ब्यूरो' नामक दुनिया की पहली समाचार समिति स्थापित की तथा समाचार संकलन के लिए यूरोपीय देशों की राजधानियों में संवाददाता नियुक्त किया। प्रारंभ में आवास अपने ग्राहकों तक विशेष वाहक या डाक विभाग की सहायता से देश-दुनिया के समाचारों को उपलब्ध कराया। बाद में, इस कार्य के लिए तार का उपयोग करने लगा। सन् 1840 में आवास ने प्रायोगिक तौर पर पेरिस, लंदन एवं ब्रुसेल्स के बीच कबूतरों के माध्यम से समाचार भेजने का कार्य प्रारंभ किया, जो अंतर्राष्ट्रीय संचार का अनोखा उदाहरण है। इससे 'न्यूज ब्यूरो' को अत्यधिक लोकप्रियता मिली। सन् 1848 में चाल्र्स आवास ने 6 से 10 किलोमीटर की दूरी पर टाॅवर बनाकर टेलीस्कोपी की सहायता से समाचारों को भेजना प्रारंभ किया। इसी साल टेलीग्राफ से समाचार भेजने की प्रणाली विकसित हुई। सन् 1849 में आवास के दो कर्मचारियों ने स्वतंत्र रूप से समाचार समिति का गठन किया। इनमें पहला था- बर्नार्ड वोल्फ, जिसने वोल्फनामक समाचार समिति शुरू की। हालांकि, बर्नार्ड वोल्फ ने एक साल पहले ही प्रायोगिक तौर पर बर्लिन से नेशनल जीतंुगशीर्षक से स्टॉक एक्सचेंज का भाव देना प्रारंभ कर दिया था। दूसरा था- जर्मनी का जुलियस रायटर था, जिसने 'रायटर' नामक समाचार समिति का गठन किया। जुलियस रायटर की समाचार समिति ने समाचार संकलन और वितरण के लिए डाकतार एवं रेलवे का भरपूर उपयोग किया।

समाचार समिति का उद्भव भले ही यूरोपीय देशों में हुआ, लेकिन इसके प्रभाव से अमेरिका अछूता नहीं रहा। सन् 1848 में न्यूयार्क के कुछ समाचार-पत्रों ने मिलकर 'हार्बर न्यूज एसोसिएशन' नामक समाचार समिति का गठन हुआ, जो नौकाओं के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय समाचार प्रेषित करती थी। सन् 1850 में 'जनरल न्यूज एसोसिएशन' का गठन हुआ। सन् 1857 में दोनों का 'नेशनल न्यूयार्क एसोसिएटेड प्रेस' के रूप में विलय हो गया। इस समिति ने यूरोप के समाचारों के लिए 'आवास' और 'रायटर' के साथ व्यापारिक समझौता किया, जो अंतर्राष्ट्रीय संचार के विकास का उदाहरण है। हालांकि यह समझौता लम्बे समय तक चल नहीं सका। इसी दौरान एक नई समाचार समिति 'यूनाइटेड प्रेस एसोसिएशन' का गठन हुआ, जिसका सन् 1909 में 'यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल' नामक एक नई समाचार समिति में विलय हो गया। यूरोप की तीनों समाचार समितियों- 'आवास', 'वोल्फ' व 'रायटर' ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्य करने का निर्णय लिया। इससे अंतर्राष्ट्रीय संचार माध्यम के रूप में समाचार समिति का विकास व विस्तार को गति मिली।

अंतर्राष्ट्रीय सूचना-प्रवाह : द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) के बाद का विश्व राजनीतिक आधार पर दो गुटो में विभाजित था। एक गुट का साम्राज्यवादी अमेरिका तथा दूसरे गुट का साम्यवादी सोवियत संघ नेतृत्व करने लगा। इनके बीच भारत जैसे कुछ तीसरी दुनिया के विकासशील देश थे, जो धीरे-धीरे विदेशी उपनिवेश से स्वतंत्र हो रहे थे। इनमें अधिकांश देश कमजोर आर्थिक स्थिति वाले थे, जिनकी न तो अंतर्राष्ट्रीय सूचना-प्रवाह में कोई योगदान था और न तो इसके महत्व को समझ पा रहे थे। अमेरिकी विदेश मंत्री 'विलियम वेन्स' ने विकसित देशों के हित में अंतर्राष्ट्रीय सूचना-प्रवाह पर जोर दिया। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) का उपयोग भी किया।

इस प्रकार, अमेरिका समेत पश्चिम के विकसित देशों का अंतर्राष्ट्रीय सूचना-प्रवाह पर एकाधिकार और मजबूत हो गया। विकसित देश अपनी समाचार समितियों के माध्यम से जैसा चाहते थे, वैसी सूचना दुनिया को उपलब्ध कराने लगे। एक तरफा प्रवाह के कारण विकसित देशों की सूचनाओं को विकासशील देश ज्यों का त्यों स्वीकार करने को विवश थे। पश्चिमी देशों की समाचार समितियों द्वारा सम्प्रेषित सूचनाएं विकासशील देशों के अनुरूप नहीं होती थी। इन सूचनाओं में विकासशील देशों के नकारात्मक पक्ष को प्रमुखता से तथा सकारात्मक पक्ष को दबाकर या विकृत रूप में प्रचारित किया जाता था। विकसित देशों की सूचना राजनीति को तीसरी दुनिया के विकासशील देश शीघ्र ही समझ गए और अंतर्राष्ट्रीय मंचों के माध्यम से भनई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था्य की मांग करने लगे।

नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था (NWICO)  अंतर्राष्ट्रीय संचार के इतिहास की पड़ताल से पता चलता है कि नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था की मांग का प्रमुख कारण विकसित देशों द्वारा असंतुलित सूचना प्रवाह था। इसके अलावा भी कई अन्य थे, जिसके चलते तीसरी दुनिया के विकासशील देश पहली दुनिया के विकसित देशों के खिलाफ लामबन्द होने लगे। यथा-
1.         द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद छोटे-छोटे साम्राज्यों के टूटने से नये देशों का अभ्युदय।
2.         पश्चिमी के औद्योगिक व विकसित देशों का नये देशों के साथ सम्बन्ध, जिससे पश्चिमी देशों का आर्थिक और राजनैतिक प्रभाव का लगातार बढ़ना।
3.         यू.एस. और यू.एस.एस.आर. के आक्रामक प्रभाव से परेशान होकर नये देशों का गुटनिरपेक्ष देशों के साथ जुड़ना।
4.         अंतर्राष्ट्रीय संगठनों- यू.एन.ओ. और यूनेस्को में विकसित देशों का वर्चस्व।

इस मुद्दे को विकासशील देशों ने गुट निरपेक्ष आंदोलन (G-77), संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) तथा संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक वैज्ञानिक सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में प्रमुखता से उठाया। अल्जीरिया में आयोजित (5-9 सितम्बर, 1975) गुट निरपेक्ष देशों के चतुर्थ सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय संचार को बढ़ावा देने के लिए नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था (NWICO) की मांग की गई। इस सम्मेलन में 75 सदस्य देश तथा 24 पर्यवेक्षक देश और तीन अतिथि देश सम्मलित हुए थे। इस मुद्दे पर सन् 1976 में ट्यनिस एवं कोलम्बो सम्मेलन में भी विचार-विमर्श किया गया।

अंतर्राष्ट्रीय संचार व्यवस्था पर आधारित विचार-विमर्श का प्रमुख केन्द्र होने के कारण यूनेस्को नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था (न्यूको) की स्थापना के लिए प्रयास किया। इसके लिए मैकब्राइड आयोग का गठन और सम्मेलन का आयोजन किया। सन् 1980 में यूनेस्को के सामान्य अधिवेशन में नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था (NWICO) के लिए निम्नलिखित दिशा-निर्देशों का निर्धारित किया:-

1.     वर्तमान संचार व्यवस्था में व्याप्त असंतुलन को समाप्त करना।
2.   एकाधिकारी, सार्वजनिक, निजी और अति केन्द्रीकृत व्यवस्था के नकारात्मक प्रभाव को समाप्त करना।
3.   विचारों एवं सूचनाओं के स्वतंत्र प्रवाह एवं विस्तारीकरण के मार्ग में आने वाली आन्तरिक एवं वाह्य बाधाओं को दूर करना।
4.   सूचना के साधनों एवं माध्यमों की संख्या में बढ़ोत्तरी करना।
5.   सूचना एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना।
6.   पत्रकारों एवं जनमाध्यमों से जुड़े लोगों की उत्तरदायित्वपूर्ण स्वतंत्रता सुनिश्चित करना।
7.   विकासशील देशों को उनकी क्षमता के अनुरूप उपकरण व प्रशिक्षण में वृद्धि करना और आधारभूत सुविधाओं, आवश्यकताओं एवं उद्देश्यों के अनुरूप् संचार व्यवस्था का विकास करना।
8.     विकसित देशों में इन उद्देश्यों की प्राप्ति में सहयोग करने की भावना जागृत करना।
9.     एक दूसरे की सांस्कृतिक पहचान और प्रत्येक देश को अपने व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक हित के बारे में विश्व को सूचित करने के अधिकार का सम्मान करना।
10.   सूचना के अंतर्राष्ट्रीय आदान-प्रदान के संदर्भ में वैयक्तिक अधिकारों का सम्मान करना।
11.   प्रत्येक व्यक्ति की सूचना एवं संचार व्यवस्था में सहभागिता के अधिकार का सम्मान करना।

नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था ही तीसरी दुनिया के देशों के विकास का प्रमुख साधन है। इसके लिए विकासशील देश लगातार प्रयत्नशील हैं।

मैकब्राइड आयोग : यूनेस्को ने सन् 1977 में एक अंतर्राष्ट्रीय आयोग का गठन किया, जिसके अध्यक्ष आयरलैण्ड के पूर्व विदेशमंत्री सीयेन मैकब्राइड थे। इस आयोग में कनाडा के विश्व विख्यात संचारविद् मार्शल मैकलुहान के अलावा मिचियो नगाई, मुस्तफा मसमूदी, मोक्तर लूविस, एल्बे मा एकेंजो समेत कुल 15 संचार विशेषज्ञ, शिक्षाविद्, पत्रकारिता एवं प्रसारण विशेषज्ञों को सदस्य बनाया गया था। मैकब्राइड आयोग ने नई अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में विकासशील देशों की आवश्यकता को केन्द्र में रखकर सूचना के मुक्त एवं संतुलित प्रवाह की समस्या का अध्ययन किया तथा 82 महत्वपूर्ण सुझाव दिये। अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद मैकब्राइड आयोग स्वतः समाप्त हो गया।

सन् 1980 में मैकब्राइड आयोग ने 'दुनिया एक - विचार अनेक' (Many Voices One world) शीर्षक से अपनी अध्ययन रिपोर्ट प्रस्तुत किया, जिसमें पश्चिमी देशों के संचार माध्यमों के साम्राज्यवादी एवं एकाधिकारवादी प्रभुत्व पर चिन्ता व्यक्त की गई थी। इस रिपोर्ट में यूनेस्को ने बेलग्रेड सम्मेलन में प्रस्तुत किया। इस दौरान पश्चिम के विकसित देशों ने मैकब्राइड आयोग के सुझावों को मानने से इंकार कर दिया। मैकब्राइड आयोग का सुझाव था कि- 'संचार माध्यमों का सामाजिक या आर्थिक नीति के औजार के रूप में उपयोग किया जाना चाहिए।' जबकि पश्चिमी देशों का तर्क था कि- 'संचार माध्यमों को अपने उद्देश्य का निर्धारण और क्रियान्वयन के मापदण्डों का स्वयं निर्धारित करना चाहिए, न कि सरकारों या अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को।'

बेलग्रेड बैठक में जिन प्रस्तावों को स्वीकृति मिली, उनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सभी सदस्य देशों से आह्वान किया गया कि वे अपनी राष्ट्रीय संचार क्षमताओं का विकास करें और विचार, अभिव्यक्ति एवं सूचना की स्वतंत्रता की रक्षा की मूल आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए संचार के विकास की रणनीति का हिस्सा बनाये। साथ ही यूनेस्कों से अपेक्षा की गई कि वह सूचना और संचार के नए क्षेत्र में समस्याओं की पहचान करने तथा उनके समाधान में निर्णायक भूमिका का निर्वाह करें। इसके बावजूद किसी प्रकार का अंतर्राष्ट्रीय कानून बनाने का निर्णय नहीं लिया। अंतर्राष्ट्रीय संचार एवं सूचना प्रवाह के संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय कानून बनाने का सबसे पहले अमेरिका ने विरोध किया और वह यूनेस्को से अलग हो गया। बाद में ब्रिटेन ने भी अमेरिका की राह पर चलना प्रारंभ कर दिया और वह भी अलग हो गया।

गुट निरपेक्ष समाचार समिति पूल : जुलाई 1976 में गुट निरपेक्ष देशों का सम्मेलन नई दिल्ली में हुआ, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय संचार के दौरान असंतुलित सूचना प्रवाह पर चिन्ता व्यक्त की गई तथा गहन विचार-विमर्श के बाद प्रस्ताव पारित कर नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था के तहत गुट निरपेक्ष समाचार समिति पूल का गठन किया गया। इसके तहत गुट निरपेक्ष देशों की समाचार समितियों के बीच समाचारों के आदान-प्रदान की व्यवस्था की गई। इस पूल का भारत सन् 1976 से 1979 तक प्रथम संस्थापन अध्यक्ष बना। इसका कार्य क्षेत्र विश्व के चारों महाद्वीपों- एशिया, पूर्वी यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका तक फैला हुआ है। गुट निरपेक्ष समाचार समिति पूल के माध्यम से चार भाषाओं- अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिष और अरबी में समाचारों का आदान-प्रदान किया जाने लगा।

पूल की गतिविधियों को संचालन एक निर्वाचित संस्था के द्वारा किया जाता है, जिसे समन्वय समिति भी कहा जाता है। पूल की अध्यक्ष का कार्यकाल तीन वर्ष का होता है। समन्वय समिति के सदस्यों का चयन क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, निरंतरता, सक्रिय सहभागिता और क्रम के आधार पर किया जाता है। भारत में न्यूज पूल डेस्क संचालन भप्रेस ट्रस्ट आॅफ इंडिया्य ;च्ण्ज्ण्प्ण्द्ध द्वारा किया जाता है।

भारत की भूमिका: अंतर्राष्ट्रीय संचार के क्षेत्न में नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था (NWICO) की स्थापना और विकास में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, क्योंकि भारत न्यूको की लक्ष्य प्राप्ति और सिद्धान्तों के पुनः निर्माण, रक्षा और आगे बढ़ाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहा है। सन् 1978 में आयोजित यूनेस्कों के 20वीं सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधि मण्डल ने श्रीलंका के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर पूरब-पश्चिम देशों के तनाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका उल्लेख जनसंचार माध्यम घोषणा में भी किया गया है। नई विश्व सूचना एंव संचार व्यवस्था के लक्ष्य अन्तर्राष्ट्रीय संचार में सामन्जस्य स्थापित करने के लिए सूचना के संतुलित प्रवाह की व्यवस्था करना है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भारत की अगुवाई में गुट निरपेक्ष समाचार समिति पूल का गठन किया गया। इसके अलावा, भारत सरकार द्वारा विकासशील देशों के प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण के उद्देश्य से नई दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान में कई प्रकार के कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है।

निष्कर्ष : उपरोक्त प्रयासों के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय संचार के क्षेत्र में विकसित देशों का वर्चस्व कायम है। इसका ज्वलन्त उदाहरण खाड़ी और अफगानिस्तान युद्ध के दौरान अमेरिकी संचार माध्यमों द्वारा प्रसारित भ्रामक सूचना। युद्ध से जुड़ी वास्तविक सूचना को प्रसारित कर भअलजजीरा्य ने अमेरिकी संचार माध्यमों को बेपर्दा किया तो उनके स्टूडियो पर हमला किया गया। द्वितीय खाड़ी युद्ध में अमेरिका ने एक तरह से अघोषित सेंसरशिप लागू किया था, क्योंकि अमेरिकी संचार माध्यमों पर उन्हीं सूचनाओं व समाचारों का प्रसारण व प्रकाशन किया जाता था, जो अमेरिकी शासन की नीतियों के अनुरूप होती थी। इसके विपरीत प्रसारण या प्रकाशन करने का प्रयास करने वालों को सेंसर और शस्त्र के बल से दबाने का पुरजोर प्रयास किया। उपरोक्त घटनाओं से स्पष्ट है कि अंतर्राष्ट्रीय संचार में सूचनाओं के राजनीतिक इस्तेमाल की प्रवृत्ति बढ़ी है। इससे जहां सूचना व समाचार का स्वतंत्र व निष्पक्ष प्रवाह बाधित हो रहा है, वहीं सूचना प्राप्त करने के वैयक्तिक अधिकार का हनन भी हो रहा है। 
अंतर्राष्ट्रीय सूचना प्रवाह की निष्पक्षता, स्वतंत्रता और निरंतरता संचार माध्यमों की परस्पर निर्भरता पर आश्रित होती है। अंतर्राष्ट्रीय संचार के दौरान एक देश के संचार माध्यम व समाचार समिति द्वारा दूसरे देश के संचार माध्यम व समाचार समिति को सूचना देने से समाचार का सतत् प्रवाह होता है। इसके लिए जितना सूचनाओं एवं समाचारों का संकलन अनिवार्य है, उतना ही उसे पाठकों व दर्शकों तक पहुंचाना। वैश्वीकरण के मौजूदा दौर में संचार माध्यमों के अंतर्राष्ट्रीयकरण के कारण विकासशील देशों के समक्ष सांस्कृतिक पहचान खोने का खतरा है, क्योंकि विकसित देश मीडिया उत्पाद (संचार माध्यमों में प्रकाशित व प्रसारित होने वाली सामग्री) के निर्यातक है। इनका निर्माण निर्यातक देश अपने सांस्कृतिक परिवेश को ध्यान में रखकर करते हैं। आयातक देश उसमें कोई परिवर्तन नहीं कर पाते हैं। इस प्रकार, आयातक देशों के समक्ष अपनी सांस्कृतिक पहचान खोने का खतरा मड़रा रहा है। वर्तमान समय में पश्चिमी देश अपने मीडिया उत्पाद के माध्यम से अपरोक्ष रूप से सांस्कृतिक सामाज्यवाद स्थापित कर रहे हैं, जिससे सांस्कृतिक सामाज्यवाद का विस्तार होता है।

21वीं शताब्दी के मौजूदा दौर में अंतर्राष्ट्रीय संचार मानव जीवन का अनिवार्य अंग बन चुका है। इस दिशा में पिछले पांच दशकों से निरंतर विकास हो रहा है। वर्तमान समय में ऐसी वैश्विक परिस्थिति बन चुकी है कि विश्व की अद्यतर घटनाओं एवं सूचनाओं की जानकारी प्राप्त करने को मानव हर पल उत्सुक है, जिसमें आधुनिक संचार माध्यम (प्रिण्ट, इलेक्ट्राॅनिक व वेब) मदद करते हैं। इन संचार माध्यमों के कारण अंतर्राष्ट्रीय संचार बेहद आसान होने के कारण लगता है कि सूचना का मुक्त प्रवाह हो रहा है।

(प्रतियोगिता दर्पण अगस्त, 2015 में प्रकाशित)

प्रसंगवश : जहां सोच वहां शौचालय

टेलीविजन स्क्रीन पर बाॅलीवुड अभिनेत्री विद्या बालनके विज्ञापन को देखने/सुनने के बाद बेटा बोला- पापा जी, जहां सोच वहां शौचालय... का क्या मतलब है? जवाब सुनने के बाद बेटे का मासूम मन तो शांत हो गया, लेकिन सवाल की गंभीरता ने मेरे युवां मन को झकझोर कर रख दिया। मानस पटल पर जोर डालते ही यादों की गांठे परत-दर-परत ढीली होने लगी, क्योंकि जिस छात्रावास में रहकर जिंदगी के हसीन सपनों को देखा... सपनों को पंख लगाने का प्रयास किया... वहां न तो शौचालय था और न तो उसके प्रति सोच थी। सोच जागी... शौचालय बना... उसके कुछ समय बाद ही रख-रखाव के अभाव में छात्रावास गिरकर खण्डहर में तब्दील हो गया।

इस छात्रावास का निर्माण सोनिया मुहल्ले में बनारस के प्रथम सांसद डा. रघुनाथ सिंह ने बगैर सरकारी मदद के कराया था। यह स्थल उनकी कर्म स्थाली थी। यहीं पर उन्होंने सन् 1930 में नमक सत्याग्रह आंदोलनचलाया और ब्रिटिश हुकुमत को हिलाकर रख दिया। इसके बदले अंग्रेजी सिपाहियों ने डा. रघुनाथ सिंह को गिरफ्तार कर चैाकाघाट जेल में बंद कर दिया, जहां से 34 दिनों बाद सत्याग्रही डा. रघुनाथ सिंह को मथुरा लाया गया और तीन माह तक फांसी घर में कैद करके रखा गया। इसके बावजूद उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का पेंशन नहीं ली। सन् 1952, 1957 और 1962 में बनारस संसदीय सीट से लगातार तीन बार सांसद निर्वाचित होने वाले गांधीवादी डा. रघुनाथ सिंह की नजर में पद और पैसे की कोई अहमियत नहीं थी। यहीं कारण है कि पं. जवाहर लाल नेहरू के मंत्रीमण्डल में शामिल होने के प्रस्ताव को दो बार लात मार दिया। सन् 1962 में प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के कार्य काल में मंत्री बनने का तीसरी बार न्योता मिला तो यह सोचकर अस्वीकार कर दिया कि मेरे मंत्री बनने से शास्त्री जी पर क्षेत्रवाद का आरोप लगेगा। सन् 1977 में प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई ने जबरदस्ती जहाजरानी निगमका चेयरमैन बनाया तो बनारस के प्रथम सांसद ने मात्र एक रूपया प्रतिमाह वेतन लेने की शर्त रख दी। हालांकि, इससे पूर्व सन् 1968 में वे इसी शर्त पर हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेडके चेयरमैन पद की जिम्मेदारी संभाल चुके थे। इस शर्त के पीछे डा. रघुनाथ सिंह का तर्क था कि... वेतन का पैसा सरकारी खजाने में रहेगा तो वतन के विकास को गति मिलेगी...

बेऔलाद डा. रघुनाथ सिंह का व्यक्तित्व जितना बड़ा था, उनकी सोच उससे भी अधिक बड़ी थी। तभी तो अपने सपनों के छात्रावास में ग्रामीण पृष्ठभूमि के गरीब विद्यार्थियों को उनके अनुकूल माहौल देने का प्रयास किया। छात्रावास के समीप कच्चा पोखरा व पक्का कुंआ खोदवाया... हनुमान मंदिर व बारादरी का निर्माण कराया... अखाड़ा में कुश्ती के साथ फर्री जोड़ी-गदा व नाल का प्रबन्ध कराया..., लेकिन शौचालय का निर्माण नहीं कराया। शौच के लिए छात्रावास के सामने रिक्त पड़ी अपनी कई बीघा भूमि का उपयोग करने को कहा, क्योंकि उस दौर में ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग खुले में शौच करना ज्यादा पसंद करते थे। समय बीता... बनारस का रंग-ढंग बदला... छात्रावास के चोरों ओर पक्के मकान बन गये, लेकिन छात्रावास का परिवेश (ग्रामीण) नहीं बदला। हालांकि, बनारस के बदले माहौल में छात्रावास के विद्यार्थियों ने शौचालय का उपयोग करना सीख लिया था। इसके लिए सुबह टहलते-टहलते सिगरा स्टेडियम चले जाते और खिलाडि़यों के शौचालय में नित्यक्रिया करके लौट आते। कुंए के पानी से नहाते... तैयार होकर अपने स्कूल-कालेज या विश्वविद्यालय चले जाते। आपात स्थिति में रिक्त पड़ी भूमि का उपयोग कर लेते।

सन् 1998 में डा. रघुनाथ सिंह छात्रावास से जुड़ाव हुआ। इस स्थल की भौगोलिक बनावट गजब की थी। कैण्ट रेलवे स्टेशन हो या रोडवेज बस अड्डा... काशी विद्यापीठ हो या सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय... सेंट्रल हिन्दू स्कूल हो या सिगरा स्टेडियम... नगर निगम पार्क हो या लंका-कैंट सम्पर्क मार्ग... थियोसोफिकल सोसाइटी की लाइब्रेरी हो या धर्म संघ भवन का पुस्तकालय... सभी 500 मीटर से पांच किलोमीटर की परिधि में थे। औरंगाबाद, पानदरीबा, नई सड़क, गोदौलिया के रास्ते दशाश्वमेघ घाट पर गंगा स्थान या गंगा आरती के लिए पैदल जाना संभव था।

छात्रावास का भवन बाहर से भले ही जीर्ण-शीर्ण अवस्था में दिखता था, लेकिन अंदर से चकाचक था। 10x10 के पांचों कमरों में किताब रखने के लिए आलामारियां थी। सभी कमरों के पिछले हिस्से में ताजी हवा के लिए खिड़की थी, जहां से पोखरा में जलक्रिड़ा करती भैसों के झुण्ड का मनोरम दृश्य दिखाई देता था। छात्रावास और पोखरा के बीच मात्र 8 फुट का कच्चा रास्ता था, जिससे होकर भैसों का झुण्ड पोखरे में आता-जाता था। भैसों के खूर से मिट्टी का कटाव बहुत तेजी से होता था, जिससे पोखरे का आकार बढ़ता जा रहा था और बरसात के मौसम में पोखरे का पानी लगने से छात्रावास की नींव कमजोर होती जा रही थी। छात्रावास में पांच कमरें थे। उचित प्रबन्ध के अभाव में सभी कमरों की अपनी कहानी थी। कमरा नम्बर-1 में बड़े काॅमरेड की लांड्री थी, जिसका उपयोग उनका स्वयं सेवकखादी के कपड़ों की धुलाई, नील, तिनोपाल व माड़ी चढ़ाई का कार्य करता था। बड़े काॅमरेड पढ़े-लिखे बुद्धजीवी व्यक्ति थे। बनारस की राजनीतिक समझ रखते थे। उनकी पार्टी का बेस वोटबैंक भी था, लिहाजा सांसद बनकर डा. रघुनाथ सिंह की जगह लेने का सपना देखते थे। धरना-प्रदर्शन के लिए 10-12 डंडों में लाल झण्डा लगाकर रखते थे। मौका मिलते ही मुर्दाबादका नारा बुलंद करने लगते थे। बड़े काॅमरेड समाज के अंतिम व्यक्ति को हक दिलाने की बात करते थे, लेकिन छात्रावास के कमरे का लांड्री में उपयोग कर गरीब विद्यार्थी को उसके अधिकार से वंचित करने से भी नहीं चुकते थे। कमरा नम्बर- 2 में डा. रघुनाथ सिंह के स्वघोषित करीबियों का अधिपत्य था। हालांकि, इस कमरें में कोई रहता नहीं था, लेकिन दरवाजे के चैकठ में जड़ा भारी-भरकम ताला दूर से ही नजर आ जाता था।

कमरा नम्बर-3 में एक युवां छात्रनेता का कब्जा था, जो काशी विद्यापीठ में हर साल एडमिशन लेते... छात्रसंघ चुनाव लड़ते... हर बार हार जाते... और हर बार सालाना परीक्षा छोड़ देते थे। यदि प्रोफेशनल कोर्सो को छोड़ दे तो मानवीकीय संकाय में मास्टर डिग्री का शायद ही कोई ऐसा विषय बचा होगा, जिसमें नेताजी ने एडमिशन न लिया हो और शायद ही ऐसा कोई विषय होगा, जिसकी मास्टर डिग्री नेताजी के पास होगी। संभवतः ऐसे लोगों के कारण ही केंद्र सरकार को छात्र राजनीति की समीक्षा के लिए लिंगदोह कमेटीका गठन करना पड़ा था। कमरा नम्बर-4 में छोटे काॅमरेड (छात्रनेता) अपने वैचारिक प्रतिद्वंदी के साथ रहते थे। दोनों की सोच अलग-अलग थी, लिहाजा एक ही कमरे में रहते हुए चूल्हा-चैका भी अलग-अलग था। छोटे काॅमरेड को किताबों से प्यार था। 3x6 फुट के तख्त पर आधा हिस्से में सोते थे और आधा हिस्से में किताबों, पत्रिकाओं और समाचार-पत्रों का ढेर लगाकर रखते थे। छोटे काॅमरेड अक्सर रात में देर से सोने थे और सुबह देर से उठते थे। नित्य क्रिया के लिए कमण्डल (लोटा) में पानी लेकर जाते थे। वापस लौटकर कमण्डल मटियाते हुए गुनगुनाते थे-
                                      

                                                 ’बीपी मंडल लिए कंडल, नेता अवध बिहारी जी...।

छोटे काॅमरेड पिछड़ी जाति आते थे और छात्र राजनीति में सक्रिय थे। काशी विद्यापीठ में पिछड़ी जाति के विद्यार्थियों की संख्या काफी अधिक थी, लेकिन छात्रसंघ में अध्यक्ष पद पर एकआध अपवादों को छोड़ दे तो ऊंची जाति के छत्रपों का अधिपत्य था, लिहाजा छोटे काॅमरेड छात्रसंघ भवन में लाल झण्डा गाड़ने की तैयारी में जुटे थे। राजनीति देश की हो या छात्रों की, पिछड़ों के महत्व को समझते थे। पिछड़ों को आरक्षण दिलाने में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बी.पी. मंडल और प्रधानमंत्री बी.पी. सिंह के योगदान को जानते थे। यह बात अलग है कि छात्र राजनीति में कामयाबी न मिलने पर छोटे काॅमरेड ने पत्रकारिता की राह पकड़ ली और एक प्रतिष्ठित समाचार-पत्र में रिर्पोटिंग करते हुए बिहार की पत्रकारिता और नक्सलवादी आंदोलनविषय पर पीएचडी की।

कमरा नम्बर- 5 में पहलवान जी का अड्डा था, जो कर्मचारी भारतीय रेलवे के थे... नौकरी कैण्ट स्टेशन पर करते थे... और प्रतिदिन नित्यक्रिया के लिए छात्रावास में आते थे। काॅमरेड का कमण्डल लेकर खुले मैदान में जाते... लंगोट पहनकर कूंए की जगत पर हर-हर महादेवके उद्घोष के साथ खड़े-खड़े नहाते... अखाड़े में डंड बैठक लगाते... कभी गदा तो कभी जोड़ी फेरते... मन में आता तो नाल के साथ दो-दो हाथ आजमा लेते... हनुमान मंदिर में माथा टेकते... घण्टा बजाते... और अपनी रामप्यारी (साइकिल) की सवारी करते हुए कैण्ट स्टेशन की ओर चल देते। एक दिन सुबह-सुबह पहलवान छात्रावास पहुंचे तो छोटे काॅमरेड अपना कमण्डल मटियाते हुए मन्ना डेकी आवाज में फिल्म दिल तो दिल है’ (1936) का गाना गुनगुना रहे थे- 

                                                            ’लागा चुंदरी में दाग छिपाऊ कैसे...

यह देख पहलवान से रहा नहीं गया और बोले- ...का हो छोटे काॅमरेड, ...का बात हव, ...आज तोहार बोल बदल गयल हव। जवाब में छोटे काॅमरेड ने कहा- ...का बताई पहलवान भईया, ...कमण्डल लेकर निपटे गयल रहली, ...ससुरी सुअर थुथुन लगा देहलस, ...अइसे में त अछन-अछन क बोल बदल जाई, ...हम कवने खेत क होरहा हई।

छात्रावास के पास खाली पड़ी जमीन में मोहल्ला कमेटी ने सुअर पाला था। सुअरों का ताण्डव लगातार बढ़ता जा रहा था। छोटे काॅमरेड की शिकायत पर उसी दिन मोहल्ला कमेटी की मिटिंग हुई, जिसमें सुअर बेंचकर शौचालय बनाने पर सहमति बन गयी। इस प्रकार, छात्रावास में शौचालय के प्रति सोच जागी... शौचालय बना... उसी साल बरसात के मौसम में कमजोर नींव के कारण छात्रावास जमींजोद हो गया।

यह घटना भले ही एक दशक पुरानी है, लेकिन बेटे के सवाल की गंभीरता ने यादों को ताजा कर दिया। बनारस के प्रथम सांसद डा. रघुनाथ सिंह की सोच को नये सिरे से साकार करने के लिए बनारस के मौजूदा सांसद एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को बजट का प्रावधान करना चाहिए।


मानव संचार : अवधारणा और विकास

 अवधेश कुमार यादव
      मानव जीवन में जीवान्तता के लिए संचार का होना आवश्यक ही नहीं, अपितु अपरिहार्य है। पृथ्वी पर संचार का उद्भव मानव सभ्यता के साथ माना जाता है। प्रारंभिक युग का मानव अपनी भाव-भंगिमाओं, व्यहारजन्य संकेतों और प्रतीक चिन्हों के माध्यम से संचार करता था, किन्तु आधुनिक युग में सूचना प्रौद्योगिकी (प्दवितउंजपवद ज्मबीदवसवहल)  के क्षेत्र में क्रांतिकारी अनुसंधान के कारण मानव संचार बुलन्दी पर पहुंच गया है। वर्तमान में रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, टेलीफोन, मोबाइल, फैक्स, इंटरनेट, ई-मेल, वेब पोर्टल्स, टेलीप्रिन्टर, टेलेक्स, इंटरकॉम, टेलीटैक्स, टेली-कान्फ्रेंसिंग, केबल, सोशल नेटवर्किंग साइट्स, समाचार पत्र, पत्रिका इत्यादि मानव संचार के अत्याधुनिक और बहुचर्चित माध्यम हैं।
     संचार : संचार शब्द का सामान्य अर्थ होता है- किसी सूचना या संदेश को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाना या सम्प्रेषित करना। शाब्दिक अर्थों में श्संचारश् अंग्रेजी भाषा के ब्वउउनदपबंजपवद शब्द का हिन्दी रूपांतरण है। जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के ब्वउउनदपे शब्द से हुई है, जिसका अर्थ होता है ब्वउउनद, अर्थात्... संचार एक ऐसा प्रयास है जिसके माध्यम से एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के विचारों, भावनाओं एवं मनोवृत्तियों में सहभागी बनता है। संचार का आधार श्संवादश् और श्सम्प्रेषणश् है। विभिन्न विधाओं केे विशेषज्ञों ने संचार को परिभाषित करने का प्रयास किया है, लेकिन किसी एक परिभाषा पर सर्वसम्मत नहीं बन सकी है। फिर भी, कुछ प्रचलित परिभाषाएं निम्नलिखित हैं -
o  ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार- विचारों, जानकारियों वगैरह का विनिमय, किसी और तक पहुंचाना या  बांटना, चाहे वह लिखित, मौखिक या सांकेतिक हो, संचार है।
o  लुईस ए. एलेन के अनुसार- संचार उन सभी क्रियाओं का योग है जिनके द्वारा एक व्यक्ति दूसरे के साथ समझदारी स्थापित करना चाहता है। संचार अर्थों का एक पुल है। इसमें कहने, सुनने और समझने की एक व्यवस्थित तथा नियमित प्रक्रिया शामिल है।
o  रेडफील्ड के अनुसार- संचार से आशय उस व्यापक क्षेत्र से है जिसके माध्यम से मनुष्य तथ्यों एवं अभिमतों का आदान-प्रदान करता है। टेलीफोन, तार, रेडियो अथवा इस प्रकार के अन्य तकनीकी साधन संचार नहीं है।
o  शैनन एवं वीवर के अनुसार- व्यापक अर्थ में संचार के अंतर्गत् वे सभी प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं, जिसके द्वारा एक व्यक्ति दिमागी तौर पर दूसरे व्यक्ति को प्रभावित करता है। इसमें न वाचिक एवं लिखित भाषा का प्रयोग होता है, बल्कि मावन व्यवहार के अन्य माध्यम जैसे-संगीत, चित्रकला, नाटक इत्यादि सम्मिलित है।
o  क्रच एवं साथियों के अनुसार- किसी वस्तु के विषय में समान या सहभागी ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रतीकों का उपयोग ही संचार है। यद्यपि मनुष्यों में संचार का महत्वपूर्ण माध्यम भाषा ही है, फिर भी अन्य प्रतीकों का प्रयोग हो सकता है।

     उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि किसी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति अथवा समूह को कुछ सार्थक चिह्नों, संकेतों या प्रतीकों के माध्यम से ज्ञान, सूचना, जानकारी व मनोभावों का आदान-प्रदान करना ही संचार है।  
     संचार के प्रकार : समाज में मानव कहीं संचारक के रूप में संदेश सम्प्रेषित करता है, तो कहीं प्रापक के रूप में संदेश ग्रहण करता है। इस प्रक्रिया में सम्मलित लोगों की संख्या के आधार पर मुख्यतरू चार प्रकार के होते हैं रू- 
1. अंत: वैयक्तिक संचार : यह एक मनोवैज्ञानिक क्रिया तथा मानव का व्यक्तिगत चिंतन-मनन है। इसमें संचारक और प्रापक दोनों की भूमिका एक ही व्यक्ति को निभानी पड़ती है। अंतरू वैयक्तिक संचार मानव की भावना, स्मरण, चिंतन या उलझन के रूप में हो सकती है। कुछ विद्वान स्वप्न को भी अंतरू वैयक्तिक संचार मानते हैं। इसके अंतर्गत् मानव अपनी केंद्रीय स्नायु-तंत्र तथा बाह्य स्नायु-तंत्र का प्रयोग करता है। केंद्रीय स्नायु-तंत्र में मस्तिष्क आता है, जबकि बाह्य स्नायु-तंत्र में शरीर के अन्य अंग। इस पर मनोविज्ञान और चिकित्सा विज्ञान में पर्याप्त अध्ययन हुए हैं। जिस व्यक्ति का अंतरू वैयक्तिक संचार केंद्रित नहीं होता है, उसे मानव समाज में च्पागलज् कहा जाता है। मानव के मस्तिष्क का उसके अन्य अंगों से सीधा सम्बन्ध होता है। मस्तिष्क अन्य अंगों से न केवल संदेश ग्रहण करता है, बल्कि संदेश सम्प्रेषित भी करता है। जैसे- पैर में मच्छर के काटने का संदेश मस्तिष्क ग्रहण करता है तथा मच्छर को मारने या भगाने का संदेश हाथ को सम्प्रेषित करता है। अंतरू वैयक्तिक संचार को स्वगत संचार के नाम से भी जाना जाता है।
2.अंतर वैयक्तिक संचार : अंतर वैयक्तिक संचार से तात्पर्य दो मानवोंके बीच विचारों, भावनाओं और जानकारियों के आदान-प्रदान से है। यह आमने-सामने होता है। इसके लिए दोनों मानवों के बीच सीधा सम्पर्क का होना बेहद जरूरी है, इसलिए अंतर वैयक्तिक संचार की दो-तरफा (ज्ूव-ूंल) संचार प्रक्रिया कहते हैं। यह कहीं भी स्वर, संकेत, शब्द, ध्वनि, संगीत, चित्र, नाटक आदि के रूप में हो सकता है। इसमें फीडबैक तुुरंत और सबसे बेहतर मिलता है, क्योंकि संचारक जैसे ही किसी विषय पर अपनी बात कहना शुरू करता है, वैसे ही प्रापक से फीडबैक मिलने लगता है। अंतर वैयक्तिक संचार का उदाहरण है-मासूम बच्चा, जो बाल्यावस्था से जैसे-जैसे बाहर निकलता है, वैसे-वैसे समाज के सम्पर्कमें आता है और अंतर वैयक्तिक संचार को अपनाने लगता है। माता-पिता के बुलाने पर उसका हंसना अंतर वैयक्तिक संचार का प्रारंभिक उदाहरण है। इसके बाद वह ज्यों-ज्यों किशोरावस्था की ओर बढ़ता है, त्यों-त्यों भाषा, परम्परा, अभिवादन आदि अंतरवैयक्तिक संचार प्रक्रिया से सीखने लगता है। पास-पड़ोस के लोगों से जुडने में भी अंतर वैयक्तिक संचार की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
3.समूह संचार : यह अंतर वैयक्तिक संचार का विस्तार है, जिसमें मानव सम्बन्धों की जटिलता होती है। मानव अपने जीवन काल में किसी-न-किसी समूह का सदस्य अवश्य होता है। अपनी आवश्यकतओं की पूर्ति के लिए नये समूहों का निर्माण भी करता है। समूहों से पृथक होकर मानव अलग-थलग पड़ जाता है। समूह में जहां मानव के व्यक्तित्व का विकास होता है, वहीं सामाजिक प्रतिष्ठा भी बनती है। समाजशास्त्री चाल्र्स एच. कूले के अनुसार-समाज में दो प्रकार के समूह होते हैं। पहला- प्राथमिक समूह { जिसके सदस्यों के बीच आत्मीयता, निकटता एवं टिकाऊ सम्बन्ध होते हैं। जैसे- परिवार, मित्र मंडली व सामाजिक संस्था इत्यादि } और दूसरा- द्वितीयक समूह  { जिसका निर्माण संयोग या परिस्थितिवश अथवा स्थान विशेष के कारण कुछ समय के लिए होता है। जैसे- ट्रेन व बस के यात्री, क्रिकेट मैच के दर्शक, जो आपस में किसी विषय पर विचार-विमर्श करते हैं} सामाजिक कार्य व्यवहार के अनुसार समूह को हित समूह और दबाव समूह में बांटा गया है। जब कोई समूह अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कार्य करता है, तो उसे हित समूह कहते हैं, लेकिन जब वह अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए दूसरे समूहों या प्रशासन पर दबाव डालते लगता है, तो स्वतरू ही दबाव समूह में परिवर्तित हो जाता है। मानव समूह बनाकर विचार-विमर्श, संगोष्ठी, भाषण, सभा के माध्यम से विचारों, जानकारियों व अनुभवाओं का आदान-प्रदान करता है, तो उस प्रक्रिया को समूह संचार कहते हैं। इसमें फीडबैक तुरंत मिलता है, लेकिन अंतर-वैयक्तिक संचार की तरह नहीं। फिर भी, यह प्रभावी संचार है, क्योंकि इसमें व्यक्तित्व खुलकर सामने आता है तथा समूह के सदस्यों को अपनी बात कहने का पर्याप्त अवसर मिलता है। समूह संचार कई सामाजिक परिवेशों में पाया जाता है। जैसे- कक्षा, रंगमंच, कमेटी हॉल, बैठक इत्यादि। 
4.जनसंचार : आधुनिक युग में च्जनसंचारज् काफी प्रचलित शब्द है। इसका निर्माण दो शब्दों  श्जनश् और श्संचारश् के योग से हुआ है। च्जनज् का अर्थ ‘जनता अर्थात भीड़’ होता है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार, जन का अर्थ पूर्ण रूप से व्यक्तिवादिता का अंत है। इस प्रकार, समूह संचार का वृहद रूप है- जनसंचार। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग १९वीं सदी के तीसरे दशक के अंतिम दौर में संदेश सम्प्रेषणकेलिएकियागया।संचार क्रांति के क्षेत्र में अनुसंधान के कारण जैसे-जैसे समाचार पत्र, रेडियो, टेलीविजन, केबल, इंटरनेट, वेब पोर्टल्स इत्यादि का प्रयोग बढ़ता गया, वैसे-वैसे जनसंचार के क्षेत्र का विस्तार होता गया। इसमें फीडबैक देर से तथा बेहद कमजोर मिला है। कई बार नहीं भी मिलता है। आमतौर पर जनसंचार और जनमाध्यम को एक ही समझा जाता है, किन्तु दोनों अलग-अलग हैं। जनसंचार एक प्रक्रिया है, जबकि जनमाध्यम इसका साधन। जनसंचार माध्यमों के विकास के शुरूआती दौर में जनमाध्यम मानव को सूचना अवश्य देते थे, परंतु उसमें मानव की सहभागिता नहीं होती थी। इस समस्या को संचार विशेषज्ञ जल्दी समझ गये और समाधान के लिए लगातार प्रयासरत रहे। इंटरनेट के आविष्कार के बाद लोगों की सूचना के प्रति भागीदारी बढ़ी है। मनचाहा सूचना प्राप्त करना और दूसरों तक तीब्र गति से सम्प्रेषितकरना संभव हो सका। संचार विशेषज्ञों ने जनसंचार की निम्न प्रकार से परिभाषित किया है - 
  •       लेक्सीकॉन यूनिवर्सल इनसाइक्लोपीडिया के अनुसार- कोई भी संचार, जो लोगों के महत्वपूर्ण रूप से व्यापक समूह तक पहुंचता हो, जनसंचार है।
  •     कार्नर के अनुसार- जनसंचार संदेशों  के बड़े पैमाने पर उत्पादन तथा वृहद स्तर पर विषमवर्गीय जनसमूहों में द्रुतगामी वितरण करने की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में जिन उपकरणों अथवा तकनीक का उपयोग किया जाता है उन्हें जनसंचार माध्यम कहते हैं। 
  •     कुप्पूस्वामी के अनुसार- जनसंचार तकनीकी आधार पर विशाल अथवा व्यापक रूप से लोगों तक सूचना के संग्रह एवं प्रेषण पर आधारित प्रक्रिया है। आधुनिक समाज में जनसंचार का कार्य सूचना प्रेषण, विश्लेषण, ज्ञान एवं मूल्यों का प्रसार तथा मनोरंजन करना है। 
  •     जोसेफ डिविटो के अनुसार- जनसंचार बहुत से व्यक्तियों में एक मशीन के माध्यम से सूचनाओं, विचारों और दृष्टिकोणों को रूपांतरित करने की प्रक्रिया है।
  •     जॉर्ज ए.मिलर के अनुसार- जनसंचार का अर्थ सूचना को एक स्थान से दूसरे स्थान पहुंचाना है।
      उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि जनसंचार यंत्र संचालित है, जिसमें संदेश को तीब्र गति से भेजने की क्षमता होती है। जनसंचार माध्यमों में टेलीविजन, रेडियो, समाचार-पत्र, पत्रिका, फिल्म, वीडियो, सीडी, इंटरनेट, वेब पोर्टल्स इत्यादि आते हैं, जो संदेश को प्रसारित एवं प्रकाशित करते हैं। 
     मानव संचार का विकास
    विशेषज्ञों का मानना है कि सृष्टि में संचार उतना ही पुराना है, जितना की मानव सभ्यता। आदम युग में मानव के पास आवाज थी, लेकिन शब्द नहीं थे। तब वह अपने हाव-भाव और शारीरिक संकेतों के माध्यम से संचार करता था। तात्कालिक मानव को भी आज के मानव की तरह भूख लगती थी, लेकिन उसके पास भोजन के लिए आज की तरह अनाज नहीं थे। वह वृक्षों के फलों और जानवरों के कच्चे मांसों पर पूर्णतया आश्रित था, जिसकी उपलब्धता के बारे में जानने के लिए आपस में शारीरिक संकेतों के माध्यम से संचार (वार्तालॉप) करता था। पाषाण युग का मानव कच्चे मांस की उपलब्धता वाले इलाकों में पत्थरों पर जानवरों का प्रतीकात्मक चित्र बनाने लगा। कालांतर में मानव ने प्रतीक चित्रों के साथ अपनी आवाज को जोडना प्रारंभ किया, परिणामतरू अक्षर का आविष्कार हुआ। अक्षरों के समूह को शब्द और शब्दों के समूह को वाक्य कहा गया, जो वर्तमाान युग में भी संचार के साधन के रूप में प्रचलित है। इस तरह के संचार का सटीक उदाहरण है- नवजात शिशु... जो शब्दों से अनभिज्ञ होने के कारण हंसकर, रोकर, चीखकर तथा हाथ-पैर चलाकर अपनी भावनाओं को सम्प्रेषित करता है। इसके बाद जैसे-जैसे बड़ा होता है, वैसे-वैसे शब्दों को सीखने लगता है। इसके बाद क्रमशरू तोतली बोली, टूटी-फूटी भाषा और फिर स्पष्ट शब्दों में वार्तालॉप करने लगता है। 
     प्राचीन काल में मानव के पास शब्द तो थे, लेकिन वह पढना-लिखना नहीं जानता था। ऐसी स्थिति में अपने गुरूओं और पूर्वजों के मुख से निकले संदेशों को किवदंतियों के सहारे आने वाली पीढ़ी तक सम्प्रेषित करने का कार्य होता था। कालांतर में भोजपत्रों पर संदेश लिखने और दूसरों तक पहुंचाने की प्रथा प्रारंभ हुई, जो भारत में काफी कारगर साबित हुई। इसी की बदौलत वेद-पुराण व आदि ग्रंथ लोगों तक पहुंचे। गुप्तकाल में  शिलालेखों का निर्माण कराया गया, जिन पर धार्मिक व राजनीतिक सूचनाएं होती थी। ऐसे अनेक स्मारक आज भी मौजूद हैं। 
     जर्मनी के जॉन गुटेनवर्ग ने सन् 1445 में टाइपों का आविष्कार किया, जिससे संचार के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। टाइपों की मदद से विचारों या सूचनाओं को मुद्रित कर अधिक से अधिक लोगों तक प्रसारित करने की सुविधा मिली। सन् 1550 में भारत का पहला प्रेस गोवा में पुर्तगालियों ने इसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए लगाया। जेम्स आगस्टक हिकी ने सन् 1780 में भारत का पहला समाचार-पत्र च्बंगाल गजटश् प्रकाशित किया। 19वीं शताब्दी में टेलीफोन और टेलीग्राम के आविष्कार ने संचार की नई संभावनाओं को जन्म दिया। इसी दौर में रेडियो और टेलीविजन के रूप में मानव को संचार का जबरदस्त साधन मिला। बीसवीं शताब्दी में इलेक्ट्रानिक मीडिया का अत्यधिक विकास हुआ। 21वीं शताब्दी में इंटरनेट ने मानव संचार को सहज, सरल और व्यापक बना दिया।

     निष्कर्ष रू मानव समाज में संचार के विकास का प्राचीन काल में जो सिलसिला प्रारंभ हुआ, वह वर्तमान में भी चल रहा और भविष्य में भी चलता रहेगा। इसका अगला पड़ाव क्या होगा, कोई नहीं जानता है। प्राचीन काल में संचार के कुछ ऐसे तरीकों का सूत्रपात किया गया था, जिसकी प्रासंगिक आज भी बरकरार है तथा आगे भी रहेंगी। वह है- यातायात संकेत, जिसे सडक के किनारे देखा जा सकता है, जिन पर दाएं-बाएं मुडने, धीरे चलने, स्प्रीड ब्रेकर या तीब्र मोड़ होने या रूकने के संकेत होते हैं। इन संकेतों को चलती गाड़ी से देखकर समझना बेहद आसान है, जबकि पढकर समझना बेहद मुश्किल है। इन संकेतों के माध्यम से संदेशों का सम्प्रेषण आज भी वैसे ही होता है, जैसे शुरूआती दिनों होता था।मानव जीवन में जीवान्तता के लिए संचार का होना आवश्यक ही नहीं, अपितु अपरिहार्य है। पृथ्वी पर संचार का उद्भव मानव सभ्यता के साथ माना जाता है। प्रारंभिक युग का मानव अपनी भाव-भंगिमाओं, व्यहारजन्य संकेतों और प्रतीक चिन्हों के माध्यम से संचार करता था, किन्तु आधुनिक युग में सूचना प्रौद्योगिकी (प्दवितउंजपवद ज्मबीदवसवहल)  के क्षेत्र में क्रांतिकारी अनुसंधान के कारण मानव संचार बुलन्दी पर पहुंच गया है। वर्तमान में रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, टेलीफोन, मोबाइल, फैक्स, इंटरनेट, ई-मेल, वेब पोर्टल्स, टेलीप्रिन्टर, टेलेक्स, इंटरकॉम, टेलीटैक्स, टेली-कान्फ्रेंसिंग, केबल, सोशल नेटवर्किंग साइट्स, समाचार पत्र, पत्रिका इत्यादि मानव संचार के अत्याधुनिक और बहुचर्चित माध्यम हैं। मानव संचार को जानने ने पूर्व मानव और संचार को अलग-अलग समझना अनिवार्य है। 

( ‘प्रतियोगिता दर्पण‘ जनवरी- 2015 अंक में पेज 101-102 पर प्रकाशित)